यदि हम अपने इतिहास को पढें तो ये देखते है की सनातन धर्म में युद्ध के नियम बहुत ही विस्तृत रूप में वर्णित हैं|
यदि महाभारत को ही ले लें, तो युद्ध से पहले उसके सभी नियम निर्धारित थे| अतिरथी से अतिरथी लडेगा, महारथी से महारथी, पैदल से पैदल लडेगा| इसी प्रकार अस्त्र शस्त्रों के बारे में भी साफ था की धनुर्विद धनुर्विद से भिड़ेगा, गदाधारी केवल गदाधारी से लड़ सकेगा| सूर्योदय से पहले और सूर्यास्त के बाद कोई लड़ाई नहीं होगी| ये सभी नियम युद्ध को भी धर्म में बांध के रखते थे और इसीलिए ऐसे युद्ध में मरने वाले योद्धा वीरगति को प्राप्त करते थे, फिर चाहे वो जीते हुए पक्ष के हो या हारे हुए|
आज के सन्दर्भ में यदि देखा जाये, तो युद्ध तो रह गया है पर धर्म गायब हो गया है| आज की लड़ाईयों में कोई भी यदि नियमो की आशा करे तो वो बेमानी है| और येही एक कारण है की लडाई झगड़ो में लोग सभी सीमायें लाँघ देते है फिर चाहे वो कानूनी हो या मानवता की हो| ये बात वैश्विक युद्धों और छोटी मोटी व्यक्तिगत लड़ाईयो, दोनों में एक सामान लागु है| एक व्यक्ति को 10 लोग मिलके मारते हैं, निहत्थे को हथियार से मारते हैं|
आज चूँकि धर्मयुद्ध की आशा रखना व्यर्थ है तो अच्छा ये होगा की समय के अनुरूप अपने को ढाल लिया जाए| शायद इस बदलते समय को भांप कर ही हमारे आदि-गुरुओं ने कलारी-पयत्तु, और गतका जैसी युद्ध कलाएं विकसित की| उन्हें पता था की आने वाले वक्त में एक-एक को दस-दस से लड़ना होगा और उसके लिए व्यक्तिगत सामर्थ्य जरूरी होगा| तो इस बदलते परिवेश में बहुत जरूरी है की हमारी आने वाली पीढियां स्वयं की और जरूरत पड़े तो औरों की भी रक्षा अकेले करने में सक्षम हो|
KALARIPAYATTU; GATKA; JUDO; KARATE; SAMBO; WUSHU; KICKBOXING; TAEKWONDO; all these are not merely sports, these are today's versions of Dharmyudhha. Lets teach these to our coming generations and make them able.