‘हेमू’ (हेमचन्द्र
विक्रमादित्य) भारतीय इतिहास के आखिरी हिन्दू सम्राट थे| उनको आधुनिक इतिहासकारों
ने ‘मध्यकालीन भारत का नेपोलियन’ की उपाधि से भी अलंकृत किया है| क्यों न हो| 16वी
शताब्दी में हेमू द्वारा जीती हुई 22 लडाईयां इस बात का प्रमाण थी|
हेमू के प्रारंभीक जीवन के बारे में इतिहासकारों की आपस में नहीं बनती| कोई उन्हें रेवाडी में जन्मित कहता है कोई उन्हें अलवर में जन्मित कहता है| कोई ब्राह्मण बताता है और कोई वैश्य| परन्तु इनमे से सच जो भी हो, कुछ बाते ध्यान देने योग्य है| जन्म से ब्राह्मण/वैश्य होते हुए भी हेमू कर्म से क्षत्रिय हुए और सम्राट बने| जो ये प्रमाणित करता है की उस समय तक भी भारतीय समाज में ये समझ बची हुई थी की वर्ण-व्यवस्था ‘कर्म-आधारित’ है नाकि ‘जन्म-आधारित’| इसी वर्ण व्यवस्था को आगे चल कर अंग्रेजो ने आकर पूरी तरह ध्वस्त कर दिया और इसकी जगह जाती-व्यवस्था को स्थापित कर दिया|
उनकी सेना में हिन्दू सरदारों के साथ अफगान सरदारों का होना भी कुछ हद तक ये साबित करता है की उस वक्त के हिन्दू-अफगानी सभी अपने को सांस्कृतिक जोड़ से हिंदुस्थानी मानते थे और मुगलों को बाहरी आक्रमणकारी|
एक और बात ध्यान देने वाली है| जब पानीपत की दूसरी लड़ाई में हेमू अकबर से हार गए और 350 वर्षों बाद स्थापित हुआ हिन्दू साम्राज्य सिर्फ 1 महीने में पराजित हो गया, उसके बाद हेमू के सभी साथियों और उन सब के परिवार वालो को इस तरह मारा गया जो नृशंस था| उनके मुंड काट के मुंड-मीनारे बनायीं गयी जोकि अगले 60 वर्षों तक ज्यों की त्यों रही| ताकि हिन्दुओं में दहशत बना के राखी जा सके ताकि फिर कोई हेमू न उठे| ये ‘अकबर महान’ के समय की बाते और कर्म हैं|
देखा जाए तो ये बात मध्ययुग से शुरू हुए सभी बाहरी आक्रमणों में सामान थी| उन सभी में धर्म के नेतृत्व का इसी पाशविक तरीके से अंत किया गया| और चूँकि हिन्दू अत्यंत सहिष्णु होते है, परिणाम ये हुआ की सदियों लग जाती थी नए नेतृत्व बनने में|
उपरोक्त हमें ये शिक्षा देता है की यदि धर्म का नेतृत्व करने के लिए कोई उठता है तो हमें सर्वस्व क्षमता से उसकी रक्षा करनी चाहिए और उसे सहेजना चाहिए| क्यूंकि फिर न जाने कितनी सदियों में कोई नया नायक मिले|
हेमू के प्रारंभीक जीवन के बारे में इतिहासकारों की आपस में नहीं बनती| कोई उन्हें रेवाडी में जन्मित कहता है कोई उन्हें अलवर में जन्मित कहता है| कोई ब्राह्मण बताता है और कोई वैश्य| परन्तु इनमे से सच जो भी हो, कुछ बाते ध्यान देने योग्य है| जन्म से ब्राह्मण/वैश्य होते हुए भी हेमू कर्म से क्षत्रिय हुए और सम्राट बने| जो ये प्रमाणित करता है की उस समय तक भी भारतीय समाज में ये समझ बची हुई थी की वर्ण-व्यवस्था ‘कर्म-आधारित’ है नाकि ‘जन्म-आधारित’| इसी वर्ण व्यवस्था को आगे चल कर अंग्रेजो ने आकर पूरी तरह ध्वस्त कर दिया और इसकी जगह जाती-व्यवस्था को स्थापित कर दिया|
उनकी सेना में हिन्दू सरदारों के साथ अफगान सरदारों का होना भी कुछ हद तक ये साबित करता है की उस वक्त के हिन्दू-अफगानी सभी अपने को सांस्कृतिक जोड़ से हिंदुस्थानी मानते थे और मुगलों को बाहरी आक्रमणकारी|
एक और बात ध्यान देने वाली है| जब पानीपत की दूसरी लड़ाई में हेमू अकबर से हार गए और 350 वर्षों बाद स्थापित हुआ हिन्दू साम्राज्य सिर्फ 1 महीने में पराजित हो गया, उसके बाद हेमू के सभी साथियों और उन सब के परिवार वालो को इस तरह मारा गया जो नृशंस था| उनके मुंड काट के मुंड-मीनारे बनायीं गयी जोकि अगले 60 वर्षों तक ज्यों की त्यों रही| ताकि हिन्दुओं में दहशत बना के राखी जा सके ताकि फिर कोई हेमू न उठे| ये ‘अकबर महान’ के समय की बाते और कर्म हैं|
देखा जाए तो ये बात मध्ययुग से शुरू हुए सभी बाहरी आक्रमणों में सामान थी| उन सभी में धर्म के नेतृत्व का इसी पाशविक तरीके से अंत किया गया| और चूँकि हिन्दू अत्यंत सहिष्णु होते है, परिणाम ये हुआ की सदियों लग जाती थी नए नेतृत्व बनने में|
उपरोक्त हमें ये शिक्षा देता है की यदि धर्म का नेतृत्व करने के लिए कोई उठता है तो हमें सर्वस्व क्षमता से उसकी रक्षा करनी चाहिए और उसे सहेजना चाहिए| क्यूंकि फिर न जाने कितनी सदियों में कोई नया नायक मिले|
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