Saturday, 19 March 2016

धर्मयुद्ध- कल और आज|

यदि हम अपने इतिहास को पढें तो ये देखते है की सनातन धर्म में युद्ध के नियम बहुत ही विस्तृत रूप में वर्णित हैं|
यदि महाभारत को ही ले लें, तो युद्ध से पहले उसके सभी नियम निर्धारित थे| अतिरथी से अतिरथी लडेगा, महारथी से महारथी, पैदल से पैदल लडेगा| इसी प्रकार अस्त्र शस्त्रों के बारे में भी साफ था की धनुर्विद धनुर्विद से भिड़ेगा, गदाधारी केवल गदाधारी से लड़ सकेगा| सूर्योदय से पहले और सूर्यास्त के बाद कोई लड़ाई नहीं होगी| ये सभी नियम युद्ध को भी धर्म में बांध के रखते थे और इसीलिए ऐसे युद्ध में मरने वाले योद्धा वीरगति को प्राप्त करते थे, फिर चाहे वो जीते हुए पक्ष के हो या हारे हुए|
आज के सन्दर्भ में यदि देखा जाये, तो युद्ध तो रह गया है पर धर्म गायब हो गया है| आज की लड़ाईयों में कोई भी यदि नियमो की आशा करे तो वो बेमानी है| और येही एक कारण है की लडाई झगड़ो में लोग सभी सीमायें लाँघ देते है फिर चाहे वो कानूनी हो या मानवता की हो| ये बात वैश्विक युद्धों और छोटी मोटी व्यक्तिगत लड़ाईयो, दोनों में एक सामान लागु है| एक व्यक्ति को 10 लोग मिलके मारते हैं, निहत्थे को हथियार से मारते हैं|
आज चूँकि धर्मयुद्ध की आशा रखना व्यर्थ है तो अच्छा ये होगा की समय के अनुरूप अपने को ढाल लिया जाए| शायद इस बदलते समय को भांप कर ही हमारे आदि-गुरुओं ने कलारी-पयत्तु, और गतका जैसी युद्ध कलाएं विकसित की| उन्हें पता था की आने वाले वक्त में एक-एक को दस-दस से लड़ना होगा और उसके लिए व्यक्तिगत सामर्थ्य जरूरी होगा| तो इस बदलते परिवेश में बहुत जरूरी है की हमारी आने वाली पीढियां स्वयं की और जरूरत पड़े तो औरों की भी रक्षा अकेले करने में सक्षम हो|
KALARIPAYATTU; GATKA; JUDO; KARATE; SAMBOWUSHU; KICKBOXING; TAEKWONDO; all these are not merely sports, these are today's versions of Dharmyudhha. Lets teach these to our coming generations and make them able.


Wednesday, 9 March 2016

हेमू- भूला हुआ सबक

‘हेमू’ (हेमचन्द्र विक्रमादित्य) भारतीय इतिहास के आखिरी हिन्दू सम्राट थे| उनको आधुनिक इतिहासकारों ने ‘मध्यकालीन भारत का नेपोलियन’ की उपाधि से भी अलंकृत किया है| क्यों न हो| 16वी शताब्दी में हेमू द्वारा जीती हुई 22 लडाईयां इस बात का प्रमाण थी|
हेमू के प्रारंभीक जीवन के बारे में इतिहासकारों की आपस में नहीं बनती| कोई उन्हें रेवाडी में जन्मित कहता है कोई उन्हें अलवर में जन्मित कहता है| कोई ब्राह्मण बताता है और कोई वैश्य| परन्तु इनमे से सच जो भी हो, कुछ बाते ध्यान देने योग्य है| जन्म से ब्राह्मण/वैश्य होते हुए भी हेमू कर्म से क्षत्रिय हुए और सम्राट बने| जो ये प्रमाणित करता है की उस समय तक भी भारतीय समाज में ये समझ बची हुई थी की वर्ण-व्यवस्था ‘कर्म-आधारित’ है नाकि ‘जन्म-आधारित’| इसी वर्ण व्यवस्था को आगे चल कर अंग्रेजो ने आकर पूरी तरह ध्वस्त कर दिया और इसकी जगह जाती-व्यवस्था को स्थापित कर दिया|
उनकी सेना में हिन्दू सरदारों के साथ अफगान सरदारों का होना भी कुछ हद तक ये साबित करता है की उस वक्त के हिन्दू-अफगानी सभी अपने को सांस्कृतिक जोड़ से हिंदुस्थानी मानते थे और मुगलों को बाहरी आक्रमणकारी|
एक और बात ध्यान देने वाली है| जब पानीपत की दूसरी लड़ाई में हेमू अकबर से हार गए और 350 वर्षों बाद स्थापित हुआ हिन्दू साम्राज्य सिर्फ 1 महीने में पराजित हो गया, उसके बाद हेमू के सभी साथियों और उन सब के परिवार वालो को इस तरह मारा गया जो नृशंस था| उनके मुंड काट के मुंड-मीनारे बनायीं गयी जोकि अगले 60 वर्षों तक ज्यों की त्यों रही| ताकि हिन्दुओं में दहशत बना के राखी जा सके ताकि फिर कोई हेमू न उठे| ये ‘अकबर महान’ के समय की बाते और कर्म हैं|
देखा जाए तो ये बात मध्ययुग से शुरू हुए सभी बाहरी आक्रमणों में सामान थी| उन सभी में धर्म के नेतृत्व का इसी पाशविक तरीके से अंत किया गया| और चूँकि हिन्दू अत्यंत सहिष्णु होते है, परिणाम ये हुआ की सदियों लग जाती थी नए नेतृत्व बनने में|

उपरोक्त हमें ये शिक्षा देता है की यदि धर्म का नेतृत्व करने के लिए कोई उठता है तो हमें सर्वस्व क्षमता से उसकी रक्षा करनी चाहिए और उसे सहेजना चाहिए| क्यूंकि फिर न जाने कितनी सदियों में कोई नया नायक मिले|